असत्य पैदा करता है अविश्वास (भाग #२) | False Unbelief (Part # 2)

27 comments

mehta
73
12 days agoBusy9 min read

असत्य पैदा करता है अविश्वास (भाग #२) | False Unbelief (Part # 2)

सचमुच बड़ी उलझन है । प्राचीन आचार्यों और विचारकों ने जो लिखा, वह प्रत्यक्ष में क्यों नहीं हो रहा है ? “सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुहं काला” वाली उक्ति आज उलटी क्यों साबित हो रही है ? दो चीजें हमेशा आदमी को उलझन में डालती हैं । एक हो तो कोई बात नहीं, किन्तु विकल्प अगर दो हों तो आदमी चक्कर में पड़ जाता है कि किसे अपनाऊँ?
true.jpg

यथार्थता यह है कि उलझनें आदमी को सोचने-विचारने का अवसर भी प्रदान करती हैं । यहां इस बात को देखना जरुरी है कि वे बातें उस युग में कही गई, जिस युग में सत्य के प्रति विश्वास था और आचरण का बहुत महत्त्व था । चरित्रशून्य ज्ञान का महत्त्व नहीं था और चरित्रशून्य धन का भी महत्त्व नहीं था । महामात्य चाणक्य ने एक बहुत सुंदर बात लिखी कि धन दो प्रकार का होता है – अर्थ और अर्थाभास । इसे आज की भाषा में कहते हैं सफेद धन और काला धन । जो न्याय, नीति और सच्चाई के साथ कमाया जाता है, वह है अर्थ । जो छल-फरेब और धोखाधड़ी से कमाया जाता है, दूसरों को धोखा देकर और दूसरों का शोषण करके कमाया जाता है, वह है अर्थाभास । वह अर्थ का आभास जरुर दे रहा है, किन्तु सच्चा अर्थ नहीं है । दुनिया की बात छोड़ दें, अगर भारत के संदर्भ में अर्थ और अर्थाभास का विवेचन और विश्लेषण किया जाए, रिसर्च की जाए तो कितना अर्थ है, कितना अर्थाभास है, यह जानकर किसी की भी आँखे खुल जाएंगी । यहां अर्थाभास का पलड़ा काफी भारी मिलेगा । नैतिकता से धनार्जन करने वाले लोग अब अल्पसंख्यक की श्रेणी में आ जाएंगे ।

हमारे देश में जौजुदा स्थिति में अर्थाभास बहुत ज्यादा है । क्योंकि सचाई और न्याय-नीति में विश्वास क्षीण हो रहा है । सच्चाई और समृद्धि दोनों साथ हो सकते हैं, आदमी को इस पर विश्वास नहीं रहा है । ईमानदारी से भी धन कमाया जा सकता है, इस बात पर लोग बहुत कम विश्वास करते हैं । इसके उदाहरण भी अब बहुत कम मिलते हैं, जबकि बेईमानी से धनवान बनने वाले लोगों के उदाहरण बहुत ज्यादा मिलेंगे । समाज में अनैतिकता बढ़ने का यही सबसे बड़ा कारण है ।

विश्वास की बहाली एक बड़ी समस्या है । इसका समाधान कैसे खोजें ? चरवाहे और भेड़-बकरियों वाली कहानी तो हम सबने सुन ही रखी है । इससे हम समझ सकते है कि चरित्र के साथ सत्य का बहुत सम्बन्ध है । असत्य बोलने पर लोग इकठठे हुए, किन्तु जब विश्वास उठ गया तो लोगों ने इकठठे होना बंद कर दिया । चरवाहे को नुकसान हुआ उसकी भेड़-बकरिया भेड़िया (एक जंगली हिंसक प्राणी) खा गया । उस समय की धारणाएं, उस समय का चिंतन चरित्र को मुख्य मानने का था । आज से दो-ढाई हजार वर्ष, बल्कि पंद्रह सौ और हजार वर्ष पहले तक भारतवर्ष का चरित्र सत्य को प्रधानता देता था । एक घटना-प्रसंग है –

एक ठाकर साहब को स्वप्न में देवी ने दर्शन दिये । बोली – “मैं सत्य की देवी हूं । अब तुम्हें छोड़कर जा रही हूं ।”

ठाकर ने कहा – “जाइये, मैं मना नहीं करूँगा । जैसी आपकी मर्जी ।”

दूसरी रात्रि को एक अन्य देवी ने दर्शन दिये । बोली – “मैं धन की देवी हूं, लक्ष्मी । तुम्हें छोड़कर जा रही हूं ।”

ठाकर ने कहा – “नहीं, मैं आपको नहीं जाने दूंगा । आप चली गई तो मेरे पास क्या रहेगा ?”

देवी ने कहा – “जहां सत्य की देवी नहीं रहती, वहां मैं भी नहीं रह सकती ।”

ठाकर की नींद खुल गई । उसने सवेरे यह बात अपने गांव के बारहठजी को बताई तो उस चारण ने तुरंत एक दोहा कहा –

सत मत छोड़ा ठाकरां, सत छोड़ा पत जाय ।

सत की बांधी लक्ष्मी फेर मिलेगी आय ।।

ठाकर साहब ! सत्य को मत छोड़ो, क्योंकि सत्य छूट गया तो विश्वास भी चला जाएगा । अगर सत्य है तो लक्ष्मीजी स्वयं चली आएगी ।

उस समय का यह प्रबल विश्वास था कि सत्य है तो लक्ष्मी आएगी, धन आएगा, समृद्धि बढ़ेगी । पर शनैः-शनै: पता नहीं कैसी हवा चली कि आज स्थिति यह है कि चरित्र का पक्ष तो बिल्कुल ही गौण हो गया । आज चरित्र को लेकर कहीं कोई चिंतन नहीं किया जा रहा है । जहां विश्वास डगमगा जाता है, श्रद्धा हिल जाती है, वहां चरित्र की बात परे हो जाती है । वह उपेक्षित हो जाता है । युग का प्रभाव कहें या अर्थशास्त्रीय अवधारणा या उसके अध्ययन का प्रभाव कहें, चरित्र को बहुत उपेक्षित कर दिया गया है । सारे लोग अर्थशास्त्र के अध्येता नहीं हैं । अर्थशास्त्र की भाषा और उसके नियमों से भी अधिकांश लोग अनभिज्ञ हैं, किन्तु अर्थ का प्राबल्य और उसकी बहुलता के कारण आज सारी बात, मनुष्य के सारे क्रिया-कलाप एक अर्थ की धुरी की ही परिक्रमा कर रहे हैं । आदमी की सारी सोच अर्थ के संदर्भ में ही है । उसकी हर प्रवृति उसे अर्थ के निकट खीँच लाती है । धर्म भी करने को उद्यत होता है तो उसके लिए अर्थ का प्रबंध करना पड़ता है । हवन-पूजन के लिए भी थोडा-बहुत अर्थ अपेक्षित हो जाता है । कथा वाचक पंडितजी भी एक निश्चित रकम लिए बिना कथा सुनाने को राजी नहीं होते । जगराता भी कराओ तो कीर्तन मण्डली वाले हजार-पांच सौ से कम पर राजी नहीं होते ।

पिछली पोस्ट का जुडाव है -

  1. https://steemit.com/life/@mehta/or-false-unbelief-part-1

The English translation of this post with the help of Google language tool as below:

There is really a big confusion. What is written by the ancient masters and thinkers, why are not they being direct? Why is the verb of "the truth of the truth, the mouth of the liars black," which is proving vomiting today? Two things always put men in confusion. There is no problem if one is there, but if there are two alternatives, then the person falls into the dilemma, who will adopt him?

The fact is that conflicts give the person the opportunity to think and think. It is necessary to look at the fact that those things were said in that era, in which age there was faith in truth and behavior was very important. Charterless knowledge was not important and characterless wealth was also of no significance. Mahamatta Chanakya wrote a very beautiful thing that money is of two types - meaning and interpretation. In today's language it is called white money and black money. What is earned with justice, policy and truth is that meaning. That is earned by fraud and fraud, by cheating others and by exploiting others, is the meaning of meaning. He is giving the impression of meaning, but does not have true meaning. Leave the world, if the meaning and interpretation of interpretation and analysis are done in the context of India, then the eyes of anybody will be opened to know what is meaning, how much meaning is to be researched. Here the meaning of meaning will be quite heavy. People who earn money with ethics will now be in the minority category.

In our country, meaning is very much in the prevailing situation. Because the belief in truth and justice-policy is weakening. Truth and prosperity can happen both, man does not believe in it. Honestly money can also be earned, people believe little at this point. Examples of this are very rare now, whereas the examples of those who become dishonest people will get much more. This is the biggest reason for immorality in society.

Restoration of faith is a big problem. How to find solutions? The story of the shepherds and the sheep has kept us all together. From this we can understand that there is a lot of truth with the character. People gathered on untrue talk, but when the belief got up, people stopped being gathered. The shepherd was killed, his sheep wolf (a wildly violent creature) ate. The notion of that time, the contemplation of that time was to recognize the character. From today to two-and a half thousand years, rather than fifteen hundred thousand thousand years ago, the character of Bharat India gave priority to truth. There is an event -

A Thackeray was seen in the dream by the Goddess. Bid - "I am Goddess of truth. Now I'm leaving you. "

Thakar said - "Go, I will not refuse. as you wish ."

On the second night another goddess appeared. Bid - "I am Goddess of wealth, Lakshmi. I'm leaving you. "

Thackeray said, "No, I will not let you go. What will I have if you go away? "

Devi said - "Where there is no goddess of truth, I can not live there too."

Thackeray's sleep opened. He told Barhhaji of his village this morning, that Churn said immediately a Doha -

Saturn did not leave Thakran, Sat should be left.

Satya Bandhi Lakshmi will get revenues.

Thackeray! Do not leave the truth, because if truth is waived then belief will also go away. Lakshmiji himself will come, if it is true.

At that time it was a strong belief that if there is truth, Lakshmi will come, money will come, prosperity will increase. But Shaniya-Shaniya: I do not know how the air turned out that today the situation is that the character's side becomes absolutely secondary. Today there is no contemplation about the character. Where faith stops, reverence shines, there the character goes beyond the point. She gets neglected. Say the effect of the era or say the effect of the economical concept or its study, the character has been very neglected. Not all people are economists' scholars. Most of the people are unaware of the language of economics and its rules, but due to the predominance of the meaning and its abundance, today all the actions of a human being are revolving around the axis of a meaning. All the thoughts of a man are in the context of the meaning. Each of his tendencies brings him closer to the meaning. If religion is to be done then it has to manage the meaning. Havan-worship also requires some meaning. Katha Pathak, Panditji too, does not agree to tell the story without a fixed amount. If Jagraata also do so, then the Kirtan congregation does not agree with less than thousand-five hundred.

असत्य और अविश्वास Steeming

Footer mehta.gif

Comments

Sort byBest