असत्य पैदा करता है अविश्वास (भाग #१) | False Unbelief (Part # 1)

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mehta
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15 days agoBusy8 min read

असत्य पैदा करता है अविश्वास (भाग #१) | False Unbelief (Part # 1)

विचार आदमी को सुलझाते भी हैं और कभी-कभी उलझन में भी डाल देते हैं । प्राचीन साहित्य में लिखे विचार मन में उलझन पैदा कर देते हैं, एक ऊहापोह, एक संदेह पैदा कर देते हैं । मन में प्रश्न उठता है कि ऐसा कैसे लिखा गया ? असत्य के बारे में लिख रहे हैं, क्या उन्होंने स्वयं असत्य नहीं लिखा ? यह बहुत बड़ा चिन्तनीय बिंदु है ।
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एक महान आचार्य ने लिखा है –

असत्यमप्रत्ययमूलकारणम्, कुवासनासद्मसमृद्धिवारणम् ।

पहली बात – असत्य अविश्वास का बड़ा मूल कारण है । दूसरी बात – असत्य समृद्धि को रोकता है, आदमी को धनी नहीं होने देता ।

ये दोनों बाते उलझन पैदा कर रही है । क्या असत्य अविश्वास का कारण है या सत्य अविश्वास का कारण बन रहा है ? आज सच कहो तो भी कोई नहीं मानेगा । मन में आशंका होती है कि झूठ बोल रहा है । जैसे आपको भी कई लोगों ने कहा होगा कि जब हम इन्कम टैक्स के लिए सही कागजात पेश करते हैं तो उस पर विश्वास नहीं किया जाता । अधिकारी लोग मानकर चलते हैं कि सच को छिपाया जा रहा है । एक नम्बर के खाते पर भी विश्वास नहीं है ।

सत्य पर विश्वास नहीं है, असत्य पर ज्यादा विश्वास है । इसलिए आदमी असत्य बोलकर काम चलाता है । सत्य पर सहसा विश्वास नहीं होता । एक गरीब आदमी सोने की मोटी चेन पहन ले तो कोई उस पर विश्वास नहीं करेगा । सब यही कहेंगे कि फूटपाथ की किसी दुकान से या मनिहारी की दुकान से खरीदी गई आर्टिफिशियल चेन है । लेकिन अगर कोई बड़ा आदमी नकली ज्वेलरी पहन ले तो कोई उस पर अविश्वास नहीं करेगा । यही समझेंगे कि पुरे चौबीस कैरेट का शुद्ध सोना है ।

सत्य और असत्य की पहचान खो गई है । वह अब बड़े, छोटे व्यक्तित्व के पैमाने से पहचानी जाती है । असत्य अविश्वास पैदा करता है । किन्तु आज की सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि सत्य पर आदमी का भरोसा नहीं रहा । लोग यह मानने लगे हैं कि सच बोलूँगा तो मारा जाऊंगा ।

जज ने मुजरिम से पूछा – “तुम्हें पता है झूठ बोलने का अंजाम क्या होगा ?”

अभियुक्त ने कहा – “जानता हूँ हुजूर । झूठ बोलूँगा तो नरक में जाऊंगा ।”

“फिर सत्य का बयान करो ।”

“क्यों ?”

“सच बोलूँगा तो अभी तत्काल जेल जाना पड़ेगा ।” अभियुक्त ने सच्ची बात कह दी ।

सत्य बोलने के खतरे हैं, इसलिए आदमी का सत्य पर से भरोसा ही उठता जा रहा है । झूठ के साम्राज्य में सत्य की हालत बहुत दयनीय है । सत्य की कसौटियां भी बहुत कड़ी हैं । आदमी को कभी-कभी सच बोलने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है । फिर असत्य की बुनियाद पर आदमी ने बड़ी तरक्की की है, चाहे वह अल्पकालिक ही क्यों न हो ? दूसरा जब देखता है कि धोखाधड़ी और झूठ-फरेब से दूसरों ने इतनी ज्यादा प्रगति कर ली तो उसे भी असत्य के रास्ते पर चलने की प्रेरणा मिलती है । आदमी सोचता है – क्या मिलेगा सत्यवादी हरिश्चन्द्र बनने से ? जैसे भी हो अपना काम तो निकालना ही है ।

आचार्यों ने लिखा है कि असत्य अविश्वास का कारण है । वर्तमान में हम देख रहे है कि सत्य अविश्वास का कारण बन रहा है । आदमी की मानसिकता में बहुत अन्तर आ गया है । असत्य विश्वास पैदा कर रहा है और सत्य अविश्वास पैदा कर रहा है । यह एक उलझन है ।

दूसरी उलझन यह है कि आदमी असत्य बोलता है, उसका सारा व्यापार और धंधा असत्य पर अवलंबित है तो समृद्धि भी उसके आंगन में दस्तक नहीं देती, यह प्राचीन काल की मान्यता रही है । आज तो यह देखने में आ रहा है कि व्यापार-धन्धे में जो जितनी ज्यादा अप्रमाणिकता करेगा, वह उतना ही ज्यादा समृद्ध होगा । अनेक लोगों से जब यह कहा गया कि जीवन में अणुव्रत को अपनाओ, नैतिक जीवन जीओ तो उत्तर मिला कि उससे क्या मिलेगा ? कुछ भी नहीं । जिन लोगों ने अनैतिकता का आश्रय लिया, उन लोगों ने विशाल कोठियां खड़ी कर लीं, बड़े आदमी बन गए । हम ईमानदारी की माला जपते रहे, नैतिक और प्रामाणिक बने रहे तो आज हालत यह है कि जिन्दगी रोटी की चिन्ता में बीत रही है ।

सत्य पर विश्वास नहीं है । यह मान लिया गया कि झूठ बोलने पर समृद्धि बढ़ती है, सच बोलने पर जहां के तहां रह जाएंगे । फायदा कुछ नहीं, नुकसान की संभावना ज्यादा है ।

The English translation of this post as below by google language tool :

Thoughts also solve the man and sometimes also put in confusion. The ideas written in ancient literature cause confusion in mind, a hypocrisy, a doubt arises. The question arises in the mind how it was written? Writing about the untruth, did they not write themselves false? This is a very worrying point.

A great teacher has written -

Assytam Pratyayamulkaranam, Kuvasnaasamamrudhiwaranam

The first thing - is a big root cause of untrue disbelief. Secondly, falsehood prevents prosperity, does not allow man to be wealthy.

Both of them are creating confusion. Is there a reason for untrue disbelief or a true unbelief? Today, nobody will agree even if it is true. There is a fear in mind that it is lying. Like you too many people would have said that when we present the correct papers for income tax, it is not believed. Officials assume that the truth is being hidden. There is no faith in the account of a number.

There is no faith in the truth, there is much faith in the untruth. That is why a man runs a false thing. Truth is not usually believed If a poor man wore a thick chain of gold, no one will believe in it. All would say that there is an artificial chain purchased from a shop of footpath or from Manihari's shop. But if a big man is wearing a fake jewelery, then nobody will believe in him. It will understand that there is a pure gold of twenty four carats.

The identity of truth and false has been lost. He is now recognized by the scale of large, small personality. Produces false distrust. But today's biggest difficulty is that there is no man's trust in truth. People have started believing that if I speak the truth I will die.

The judge asked the criminal - "You know what will be the consequence of lying?"

The accused said - "I know Hujoor. I will lie and then go to hell. "

"Then make a statement of truth."

"Why?"

"If I tell the truth then I will have to go to jail immediately." The accused told the truth.

There are dangers to speaking the truth, so the trust of man is rising on the truth. The condition of truth is very miserable in the empire of lies. The truths of the truth are also very strict. Sometimes a person has to pay a great price to speak the truth. Then, on the basis of untruth, the man has made great progress, even if it is short-lived? Secondly, when others see that fraud and lies have made so much progress, it also inspires to follow the path of untruth. Man thinks - what will get Satyarthi Harishchandra? Whatever happens is to get rid of your work.

Acharyas have written that there is a reason for untrue disbelief. At present, we are seeing that the truth is becoming the cause of disbelief. There is a lot of difference in man's mindset. Creating false beliefs and creating truth is causing distrust. This is a maze.

The other is the confusion that man speaks untrue, his business and business are dependent on the false, then prosperity also does not knock on his courtyard, it has been the tradition of ancient times. Today it is coming to see that the more authenticity of business, the more rich it will be. When it was said to many people that adopt the atomic energy in life, live a moral life, then the answer is what will get from it? nothing . Those who took shelter of immorality, raised huge chairs, became big men. If we continue to be honest and honest, we are living in the spirit of bread, so today the condition is that life is passing in the breadth of bread.

Do not believe in the truth. It was assumed that prosperity increases on lying, where the truth will remain. The advantage is nothing, the probability of loss is much more.

असत्य और अविश्वास Steeming

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