असत्य पैदा करता है अविश्वास (अंतिम भाग #४) | False Unbelief (Final Part # 4)

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mehta
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12 days agoBusy7 min read

असत्य पैदा करता है अविश्वास (अंतिम भाग #४) | False Unbelief (Final Part # 4)

इस असत्य-सत्य और अविश्वास-विश्वास की बातों को थोड़ा और समझते हुए, इस विषय को विराम देते हैं । तो आइये पिछली तीन पोस्ट से आगे बढ़ते है -
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झूठ का प्रचलन इतना ज्यादा हो गया है कि अब उस पर अविश्वास करना बहुत मुश्किल हो रहा है । पुराने ज़माने में कहा जाता था कि अनजान फल नहीं खाना चाहिए । आज यह कहा जाना चाहिए कि अनजान आदमी के हाथ का कुछ भी नहीं खाना चाहिए । आजकल लगभग सभी सार्वजनिक स्थानों पर चेतावनी लिखी होती है कि “अनजान आदमी से कोई भी खाने-पीने के वस्तु स्वीकार न करें” । उसके बाद भी आदमी पेशेवर लुटेरों के चुंगल में फंस ही जाता है । हम सभी प्राय: रोज ही अखबारों में इस तरह की ख़बरें पढ़ते हैं ।

भिवानी जिले में शराब की रोज की बिक्री 25 से 30 लाख रूपये की है । जहाँ इतना ज्यादा शराब का सेवन होता हो, वहां झूठ के व्यापार का अंदाजा लगाया जा सकता है क्योंकि नशे और झूठ का बहुत ही गहरा सम्बन्ध होता है । सरकार की ओर से शराब की बुराई प्रदर्शित करने वाले बड़े-बड़े विज्ञापन प्रसारित किये जाते है और दूसरी ओर शराब के लायसेंस भी बड़ी उदारता से बांटे जाते हैं । समझ नहीं आता की सरकार की नीति क्या है ? अधिकाधिक राजस्व प्राप्त करना सरकार का लक्ष्य और उद्देश्य है । अत: इन्हें बुराई की जड़ भी बताते है और इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित भी करते है । सरकार जनता के कल्याण की नीति पर चल रही है अथवा उसकी बर्बादी के संसाधन जुटा रही है, कुछ एकदम से समझ में नहीं आता है ।

बड़ी विरोधाभासी बात है । न्यायशास्त्र में एक दोष कहा गया है – चक्रक । आदमी उलझ जाता है कि सही क्या है और गलत क्या है । चक्र के जाल से निकल पाना बहुत कठिन हो जाता है । कुछ बातें समझ से परे होती है । जैसे आरक्षण को ही देख लीजिए, जिस तरह से आरक्षण बांटा (दिया) जा रहा है क्या यह सही है तरीका है ? योग्य बनाने की दिशा में न तो सरकार का ध्यान जा रहा है और न ही इस दिशा में कोई प्रयत्न किया जा रहा है । इसके बजाय संघर्ष और विद्वेष की चिंगारी को हवा दी जा रही है । मुद्दे को बहस में उलझाया जा रहा है । योग्यता अगर नहीं आई तो कोरे आरक्षण से किसी का कुछ भला नहीं होगा । मेरी दृष्टि में ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा जैसा कुछ भी नहीं है । किन्तु सरकार उन्हें कुछ विशेषण देकर बात करती है । सरकार जिसके काम से स्वयं संतुष्ट नहीं है तो वे लोगों का भला क्या कर पाएंगे । क्योंकि जिसने स्वयं बैसाखी का सहारा लिया हो, वह दुसरे को एक अच्छा मैराथन धावक नहीं बना सकता । मेरा कहने का सिर्फ तात्पर्य यह है कि आरक्षण तो होना चाहिए, परन्तु इसका पैमाना कुछ ओर ही होना चाहिए । जिससे सभी जरुरतमंदो का भला हो और सारे देश का भला हो ।

धर्म के क्षेत्र में भी योग्यता बहुत कम बढ़ रही है । धर्म के नाम पर बहुत कुछ चलता है किन्तु धार्मिक आदमी में जो योग्यता बढ़नी चाहिए, वह नहीं आ रही है । उसका कारण यही है कि धार्मिक होने की जो पहली शर्त है नैतिक और ईमानदार, अणुव्रती होना उस पर किसी का ध्यान नहीं है । आचरण के साथ आज धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं रहा है । केवल भक्ति और पूजा-पाठ जैसे अनुष्ठान के साथ धर्म का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है । धार्मिक केवल उसे कहा जा सकता है जो अपने दैनिक जीवन में ईमानदार और नैतिक है । अगर आप अपने जीवन में ईमानदार, सत्यनिष्ठ, न्यायनिष्ठ, कर्तव्यपरायण हैं तो फिर आपको किसी से धार्मिक का सर्टिफिकेट लेने की जरुरत नहीं है । आप विशुद्ध धार्मिक है ।

सत्य-असत्य, विश्वास-अविश्वास सम्बन्धी उलझनों का तो एक-दो दिन में समाधान नहीं हो सकता । किन्तु इस पर चिंतन करने की अपेक्षा जरुर है कि प्राचीन काल में जो लिखा गया और आज जो हो रहा है, उसमे इतना अन्तर और विरोधाभास क्यों है ? मैं समझता हूँ अगर इस बात पर चिंतन किया जाएगा तो उलझन का कोई-न-कोई समाधान भी जरुर निकल जाएगा ।

पिछली पोस्टों का जुड़ाव है -

  1. https://steemit.com/life/@mehta/or-false-unbelief-part-1
  2. https://steemit.com/life/@mehta/or-false-unbelief-part-2
  3. https://steemit.com/life/@mehta/or-false-unbelief-part-3

The English translation of this post with the help of Google language tool as below:

Understanding this untrue-truth and unbelief-believing beliefs, pauses this topic. So let's move on from the last three posts -

The practice of lies has become so much that it is now difficult to disbelieve it. In ancient times, it was said that unknowable fruits should not be eaten. It should be said today that nothing unaware person should eat anything. Nowadays, there is a warning in almost all public places that "do not accept any food items from unknown people". Even after this, man gets stuck in the thugs of professional robbers. We all often read such news every day in the newspapers.

Daily sale of liquor in Bhiwani district is 25 to 30 lakh rupees. Wherever much alcohol is consumed, there can be an indication of false business as there is a deep connection between drugs and falsehood. Large advertisements displaying the evil of the liquor by the government are broadcasted and on the other hand liquor licenses are also distributed generously. Do not understand what the government's policy is? Gaining more revenue is the goal and purpose of the government. Therefore, they also tell the root of evil and also encourage them to use. The government is pursuing the welfare policy of the public or it is gathering resources for its waste, something is not immediately understood.

There is a big contradiction. One defect is said in jurisprudence - Chakkar. The man is confused what is right and what is wrong. Getting out of the trap of the wheel becomes very difficult. Some things are beyond understanding. Just look at reservations, the way the reservation is being distributed (given) is it the right way? Neither the government's attention is going in the direction of making the worthy and neither is there any attempt in this direction. Instead, the spark of conflict and hostility is being given to the wind. The issue is being entangled in the debate. If no qualification comes, then there will be no good for anyone with reservation. There is nothing like high-low, small, big in my eyes. But the government talks about giving them some adjectives. If the government is not satisfied with its work, then what will they do to the people? Because one who has helped himself with crutches, he can not make another a good marathon runner. The only thing I have to say is that the reservation should be, but its scale should be on some side. That is the good of all the needy and the good of the whole country.

Ability is also increasing in the field of religion. There is a lot going on in the name of religion, but the ability to increase in the spiritual man is not coming. The reason for this is that the first condition of being religious is to be ethical and honest, to be atomic and not to meddle on anyone. Religion has no relation with religion today. Only the relation of religion with devotion and worship like rituals has been added. Religious can be called only those who are honest and ethical in their daily life. If you are honest, truthful, just and dutiful in your life, then you do not need to get any religious certificate from anyone. You are pure religious.

Truth-false, trust-skeptic conflicts can not be solved in a day or two. But it is necessary to contemplate it that what has been written in ancient times and what is happening today, why there is so much difference and paradox? I think if this will be contemplated then some solution of the confusion will surely come out.

असत्य और अविश्वास Steeming

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